सवाल - वहाबी किसे कहते हैं और उनका अकीदा क्या है?
जवाब - मुहम्मद बिन अब्दुल वहाव के मानने वालों को
वहाबी कहते हैं, इस मज़हब का बानी मुहम्मद बिन अब्दुल बहाब नजदी है जिसके बारे में शैखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद टांडवी देवबन्दी अपनी किताब "आसिहाबुस्साकिब" में लिखते है। कि "मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब नजदी इब्तेदाऐ तेरहवीं सदी में नज्द अरब से ज़ाहिर हुआ और चूंकि यह ख्यालाते फासिद और अकाइदे बातिल रखता था, एहले सुन्नत व जमाअत से कत्लो किताल किया, उनको बिल्जब्र अपने ख्यालात की तकलीफ देता रहा, उनके अमवाल को गनीमत का माल और हलाल समझता रहा, उनके कत्ल करने को बाइसे सवाब व रहमत शुमार करता रहा, एहले हरमैन को खुसूसन और एहले हिजाज़ को उमूमन उसने तकलीफे शाक्का पहुँचाई। सल्फ सालेहीन और अत्बाअ की शान में निहायत गुस्ताख़ी और बे अदबी के अलफाज़ इस्तेमाल किऐ, बहुत से लोगों को बे वजह उसकी तकलीफे शदीदा के मदीना मुनव्वरा और मक्का मुअज़्ज़मा छोड़ना पड़ा। और हज़ारों आदमी उसके और उसकी फौज के हाथों शहीद हो गऐ"।
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Mufti Salman Azhari Biography Hindi
इसने अपना मज़हबे बातिल फैलाने के लिए एक किताब लिखी जिसका नाम "किताबुत्तौहीद" रखा। उसके ज़रीए नबियों और वलियों और खुद हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम की
दिल खोलकर तौहीन की फिर उसी का तरर्जुमा हिन्दुस्तान में इस्माईल देहलवी, ने क्या जिसका नाम तकवीयतुल ईमान रखा उसी ने यहाँ वहाबियत फैलाई इस वक्त ईसमाईल देहलवी रशीद अहमद गंगोही और कासीम नानौतवी अशरफ अली थानवी और तक्वियतुल ईमान को मानने वाला या असके मुताबिक अकीदे रखने वाला वहाबी है।
मो०बिन अब्दुल बहाव का अकीदा था कि :
"जुमला एहले आलम व तमाम मुसलमानाने दयार मुश्रिक व काफिर हैं और उनसे कत्लो किताल करना, उनके अमवाल को उनसे छीन लेना हलाल व जाइज़ बल्कि वाजिब है। वह सिर्फ अपने आपको मुसलमान समझते हैं" ।
(रद्दल मुहतार जिल्द सोम पेज 319, फ्तावा रिज़विया 9 पेज 4 आसिहाबुस्साकिब पेज 43)