झुके ना बार ए सद एहसान से क्यों बिनाए फ़लक | Jhuken Na Baar e Sad Ahsaan Se Kyun Binaye Falak

 

झुके ना बार ए सद एहसान से क्यों बिनाए फ़लक | Jhuken Na Baar e Sad Ahsaan Se Kyun Binaye Falak

झुके ना बार ए सद एहसान से क्यों बिनाए फ़लक 

तुम्हारे ज़र्रे के पर तो सितार हाए फ़लक


ये ख़ाक ए कुचा ए जानां है जिसके बोसे को 

ना जाने कब से तरसते हैं दीदहाए फ़लक


अफ़ ओ अज़मत ए ख़ाक ए मदिनाह क्या कहिए 

उसी तुराब के सदक़े है ऐतदाये फ़लक 


ये उनके जलवे की थीं गर्मियां शब ए असरा 

ना लाए ताब ए नज़र बहके दीदहाए फ़लक


क़दम से उनके सर ए अर्श बिजलियां चमकीं 

कभी थे बंद कभी वा थे दीदहाए फ़लक


मैं कम नसीब भी तेरी गली का कुत्ता हूं 

निगाह ए लुत्फ़ इधर हो ना यूं सताए फ़लक


ये किस के दर से फिरा है तू नज्दी बे-दीन 

बुरा हो तेरा तेये सर पे गिर ही जाए फ़लक


जो नाम ले शह ए अर्श ए बरीं का तू अख़्तर 

बसद अदब पए तस्लीम सर झुकाए फ़लक.



Poet : Huzoor TajushSharia

MUHAMMAD SAQIB

My Name Is Muhammad Saqib Raza Qadri Qureshi ( SAQIB QADRI ASJADI ) From PILIBHIT Nearest Bareilly Uttar Pradesh India 262001 | I am currently pursuing Bachelor of Arts

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