झुके ना बार ए सद एहसान से क्यों बिनाए फ़लक
तुम्हारे ज़र्रे के पर तो सितार हाए फ़लक
ये ख़ाक ए कुचा ए जानां है जिसके बोसे को
ना जाने कब से तरसते हैं दीदहाए फ़लक
अफ़ ओ अज़मत ए ख़ाक ए मदिनाह क्या कहिए
उसी तुराब के सदक़े है ऐतदाये फ़लक
ये उनके जलवे की थीं गर्मियां शब ए असरा
ना लाए ताब ए नज़र बहके दीदहाए फ़लक
क़दम से उनके सर ए अर्श बिजलियां चमकीं
कभी थे बंद कभी वा थे दीदहाए फ़लक
मैं कम नसीब भी तेरी गली का कुत्ता हूं
निगाह ए लुत्फ़ इधर हो ना यूं सताए फ़लक
ये किस के दर से फिरा है तू नज्दी बे-दीन
बुरा हो तेरा तेये सर पे गिर ही जाए फ़लक
जो नाम ले शह ए अर्श ए बरीं का तू अख़्तर
बसद अदब पए तस्लीम सर झुकाए फ़लक.
Poet : Huzoor TajushSharia