लब ए कौसर है मेला तिशनाह कामान ए मोहब्बत का वोह उबला दस्त ए साक़ी से वोह उबला चश्मा शरबत का
ये आलम अम्बिया पर उनके सरवर की इनायत का
जिसे देखो लिए जाता है परवानाह शफ़ाअत का
पिला दे अपनी नज़रों से छलकता जाम रुयत का
शाह ए कौसर तराहेम तिशनाह जाता है ज़ियारत का
वही जो रहमत तुल लिल'आलमीन हैं जान ए आलम हैं बड़ा भाई कहे उनको कोई अंधा बसीरत का
मह ओ ख़ुर्शीद ओ अंजुम में चमक अपनी नहीं कुछ भी उजाला है हक़ीक़त में उन्हीं की पाक तल'अत का
भटका यूं फिरे कब तक तुम्हारा अख़्तर ए ख़स्ता
दिखा दो रास्ता इस को ख़ुदारा शहर ए उल्फ़त का
Naat e paak
Kalam e TajushSharia
LASHKAR E RAZA